सिहरन
ज़ीस्त के नज़ारे वीरान पड़े हैं
अब किसकी धूप में पिघलोगे
मस्त मलंग नैनो में तेरे
पड़ न जाए उम्मीदोँ की धूल
ठन्डे हाथोँ से दिल थामा है
यह दुआ है और इस्तीफा भी
१३ नवम्बर, २०११
सवालोँ से डर
पैरो से पत्तो में सरसराहट हुई
सांसें रूकती झिझकती सी थीं
चांदनी की चादर जितनी लम्बी थी
उतने ही लम्बे मेरे दो कदम थे
मन का आँगन लेकिन पार न हो पाया
ऐसी कौनसी चिंता है तुम्हारी
ऐसा कौनसा गरजता हुआ सवाल
जिससे दिल यूँ काँप उठा है?
दिन की तरह गर सवाल ढल जाते
सुबह की तरह फिर जवाब भी टल जाते
५ सितम्बर, २०११
तुझसे नाराज़ नहीं, ज़िन्दगी - गुलज़ार, ‘मासूम’
तुझसे नाराज़ नहीं, ज़िन्दगी,
हैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालो से
परेशान हूँ मैं
आज अगर भर आयीं हैं, बूँदें बरस जायेंगी
कल क्या पता, इनके लिए आँखें तरस जायेंगी
जाने कब ग़म हुआ, कहाँ खोया
एक आंसू छुपाके रखा था
तुझसे नाराज़ नहीं, ज़िन्दगी,
हैरान हूँ मैं
तेरे मासूम सवालो से
परेशान हूँ मैं
५ सितम्बर, २०११